सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

याद - 3

एक आवाज़,
रात के सन्नाटे का खून करती
एक आवाज़
बहुत दूर से आती है,
सपनो के मानसर में तैरती
मेरी हंसपंखी यादों को
निगल जाती है ।

प्यार की परछाइयां
मंडराती हैं,
खिड़की के परदे
थरथरा कर
थम जाते हैं,
अस्तित्व के दावेदार
कई विचार
छटपटा कर
दम तोड़ देते हैं,
मैं सोचता हूँ
आखिर यह मनहूस
मर क्यों नहीं जाती ।



याद -2

मन में
मचलती यह साध
मुखर होती याद की
गर्दन दबा दूं ।

आज मन के कैनवस पर
चित्र तेरा
बहुत गहरा हो उठा है ,
एक कूंची उठे जबरन
निठुरता से क्रॉस कर जाए
तुम्हारे रूप को ।

तुम्हारे नाम के आगे
( जो धमनियों में
एक सिहरन पूर देता )
कलम से
ऐसा विशेषण एक झर जाये
जिससे तुम्हे चिढ़ हो ।

एक ऐसा प्रबल झोंका जन्म ले
जो तुमसे जुडी
हर वस्तु को
धुंए सा तोड़ डाले
उडादे दूर ।

लेकिन न जाने क्यों
होता नहीं कुछ ,
लाचारी इतनी बढ़ी है
की सहम कर
स्वयं में ही
सिमटने लग गयी है ,
और तुम्हारी याद
गहरी ,
और गहरी ....... और गहरी ।

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

याद-1

अनजाने ही
लाल हो जाता है
कोई सन्दर्भ ,
कौंध उठती है तुम्हारी याद।

किसी कागज़ का
सफ़ेद क्षितिज
भरता रहता है
आड़ी - तिरछी रेखाओं से
जो शायद किसी बिंदु पर
आपस में मिलती हैं।

तुम्हारा नाम लिख
बगल में
एक और नाम
करता हूँ अंकित
जिससे तुम्हे चिद थी ,
उस पर टेकता हूँ होंठ
कोई विरोध नहीं होता।

दुहराता हूँ वह सभी
जो सुनना भी
नापसंद था तुम्हे,
फिर - फिर सुनता हूँ
जतन से संभाल कर रखा
पुराना रिकॉर्ड
जो तुमको भाता था।

शून्य में निहारता हूँ
देर तक ,
दिन में भी
ढूँढता हूँ अरुंधती
नीले आकाश में।

बाहर निकल
हवा को लिपटने देता हूँ ,
चिर परिचित
सिहरन की लहरों में
महसूसता हूँ तुम्हे
बार - बार।

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

अमृत्यु

यह सच है
कि भारी आवाजों के बीच
टूट गयी थी रात की खामोशी
पर क्यों
आखिर क्यों मान लिया तुमने
उन आवाजों से अपना सम्बन्ध।

क्या तुम्हारे पास नहीं थी
कोई उफनती नदी
या वह सूख गयी इतनी जल्दी
कि कमजोरी - घबराहट के नीचे दबे
तुम हर आहट पर सहमते रहे,
और मैं
किसी अज्ञात नाटक में फँस कर
संवादों के द्वारा
तुम्हे समझाता रहा ।

कितना विचित्र था वह क्षण
मैं अपने सामने खडा था
लोग हंस रहे थे
नहीं पता था उन्हें
दोस्ती की भाषा दूसरी होती है
दुश्मनी की दूसरी ।
जाओ , अब तुम जाओ
और चुन -चुन कर
ह्त्या कर दो उन सपनों की
जो तुम्हारी खुली आँखों में बंद हैं ।

नहीं, अब अभिनय नहीं करूंगा मैं
इससे तो अच्छा है
पेट में तपती आग से तंग आकर
खा लेना अपना ही मांस
और भुला देना वह काला सा शून्य
जो कन्धों पर झुका है ।

लेकिन तुम नहीं करोगे यह सब,
( सहोगे भी नहीं )
सिर्फ दूसरों की ज़मीन पर खड़े होकर भाषण दोगे
या विस्थितियों के समुद्र में
चुपचाप सौंप दोगे अपनी चेतना
लहरों को ।

मैंने देखा है
मुहँ से झाग और नारे
साथ -साथ उगलता हुआ जुलूस
जब भी गुज़रा है
तुम एक चालाक नेता की तरह
उसके पीछे चले हो निःशब्द
और जब सड़क हावी होने लगी है
तुम लोमड़ी की तरह चक्कर काट कर
गायब हो गए हो ।

हर बार
घटनाओं के जाल में फंसते समय
बहस का रुख
तुमने मौसम या बाज़ार भाव की ओर
मोड़ दिया है,
जाओ अब तुम जाओ
और किसी स्याह किले की दीवारों पर
पटकते रहो अपना सर ।

मुझे नहीं पता था
इतना कातर है तुम्हारा आसमान
कि हताश होने पर
तुमसे भी नीचा हो जाता है ,
तुम किसी कंधे पर
टिका देते हो अपना माथा
और वह किसी अंधी गुफा की
दीवार टटोलता रहता है |

नहीं , मैं नहीं करूंगा यह सब
सहूंगा भी नहीं,
जिनका जीवन संगीत बन चुका हो
वे सहें ,
मुझे तो गिनने हैं
उस मगरमच्छ के दांत
जो जीवन की लहरों पर
मौत बन कर नाचता रहता है ।

लोग हसेंगे ..... हँसे ,
सभाएं करें ,
मन चाही धुन पर
दुहराते रहें राष्ट्रगीत ,
उन्हें नहीं पता
संज्ञाओं में जीना
मैंने छोड़ दिया है ,
दिवास्वप्नों से
मुझे चिढ है ।

पर तुम जाओ ...... जाओ
और किसी ऊँचे पहाड़ से
लुढ़का दो स्वयं को
गेंद की तरह ।

मुझे पता है
अधिक से अधिक
किसी बेहूदा इश्तेहार की शक्ल में
तुम दीवारों पर चिपक जाओगे
मरोगे नहीं,
पर तुम जाओ ...... जाओ
और कम से कम
अपने खून का रंग जान लो ।





मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

आत्मारोहण

मेरे सामने फैला है एक सैलाब
तुम उसे कुछ भी कह सकते हो।

मेरे व्यक्तित्व की परछाइयौ
काँपती हैं जिसमे लगातार
और मैं
अपने भीतर उफनते काले झाग
और इस देश के भयावह इतिहास से
अपरिचित हो जाता हूँ यकायक।

किसी तेज़ हथियार की तरह
पसलियाँ चीर कर
गुज़र जाते हैं सवाल,
सपनों की तरह
जिनके अर्थ उल्टे- सीधे हैं।

तब इसी सैलाब के वक्ष पर
उतरती है एक नाव ,
आकृतियाँ स्त्रियों और पुरुषों की
जिसमे धुंए की भांति भरी हैं,
मेरा दम घुटता है
लेकिन अपने गुस्से के लिए
सही शब्द की तलाश करते -करते
मैं जड़ हो जाता हूँ ,
लगता है
अब मैं कुछ नामालूम अस्थियों में
जीवित रहूँगा ।

भय से कांपते बहुत से हाथ
उधार लिए काठ के सहारे
खड़ा करते हैं एक वृक्ष
जिसके सिर पर तीन पत्तियाँ हैं
जनतंत्र , शासन , विरोध
और जिसकी हर डाल पर उल्टे लटके लोग
संक्रांति का सर्कस करते हैं ।

धीरे -धीरे
उनकी हथेलियों में उग आते हैं गहरे घाव
जिन्हें वे धूप में खुला छोड़ देते हैं
सुखाने के लिए
और जब - जब बदलता है मौसम
या चदते हैं बाज़ार भाव
सारे के सारे घाव
कुछ समृद्ध चेहरों पर
चिपक जाते हैं ।

उनके घावों से बूँद -बूँद टपकता खून
सैलाब को लाल कर देता है ,
लाल पानी पीकर
वे लौटते हैं अपने घर
जिसके द्वार पर
खूंखार आदिम पैरों के निशान हैं ,
बाहर खड़े ही खड़े
वे हवा में फेंक देते हैं एक निरर्थक सा प्रश्न
"यह क्या हो रहा है
आखिर यह हो क्या रहा है
कि हर व्यक्ति
किसी दूसरे के घर में घुस गया है ? "

दिशाओं से टकरा कर
प्रश्न चिंदियों में बिखर जाता है ,
साहस के पर्वत
छोटे होते -होते
पुतलियों में पैठ जाते हैं ,
भय की इमारत
कन्धों पर खड़ी होने लगती है ।

वे रेत के ढेर में छुपा लेते हैं अपनी आँखें
और दार्शनिक या संत या नेता के
लबादे ओढ़ लेते हैं ,
आत्मारोहण बुनियादी झूठ में बदल जाता है ,
सैलाब उसी क्षण से
सफ़ेद होने लगता है ।