कभी-कभी ऐसा भी होता है
कि आँखों में
उग आता है एक शहर...
नहीं, जंगल ।
जंगल में होता है
सूखा तालाब ,
बड़े-बड़े पेड़
छोटे भी,
जिनका होना
मायने नहीं रखता ।
आँधियाँ नहीं आतीं यहाँ
और नहीं रहते आदमी
सिर्फ बातें होती हैं हर रोज़
आँधी और रेत की,
और रहती हैं कुछ आकृतियाँ
आदमीयत के हिज्जे करने में मशगूल ।
ऐसे ही शहर
नहीं जंगल में
वह आया लडखडाता हुआ,
छिले थे उसके घुटने ,
सूजे थे आँखों के पपोटे
और होठों से रिस रहा था खून ।
" तुम हार गए "
मैंने कहा ,
वह हँसा,
अपनी आँखें मिचमिचाते हुए
होठों से रिस रहे खून को
पीक की तरह थूकते हुए बोला --
क्या दिया है लड़ाई ने मुझे
ज़ख्मों के सिवाय ,
अच्छा है चुप रहना
और यों ही हार जाना
लेकिन नहीं समझोगे तुम
कितना सुख है
हार जाने में
याने ढीली कर देने में
बंधी हुई मुट्ठियाँ ।
लड़ाई ?
क्या होगा उससे
और किससे लड़ोगे तुम ?
उनके किले की दीवारें
बेहद चिकनी और मज़बूत हैं,
तुम चोट करते रहो उन पर
और फोड़ लो अपना सिर
वे द्वार नहीं खोलेंगे
नहीं समझेंगे तुम्हारी भाषा
और तुम्हारी युयुत्सा
टूटती रहेगी हर क्षण ।
वह देखो
दौड़ता आ रहा है
सूर्य का दैदीप्यमान रथ ,
तुम नहीं रोक सकोगे उसे ,
तुम्हे रौंदकर गुज़र जाएगा वह
और तुम चुप रहोगे
क्योंकि रोने या चीखने पर
तुम्हे अपनी आँख या जीभ
या ज़मीन खोने का डर रहेगा ,
लड़ाई .... आखिर क्या होगा उससे
और किससे लड़ोगे तुम
वे तुम्हारी बात नहीं सुनेंगे ।
समझने के लिए
एक ही भाषा समझते हैं वे
गुलामी की ,
आग से चिढ़ते हैं वे
और एक ही तरीका पसंद है उन्हें
जानते -बूझते ज़हर पीने का,
चुपचाप जीने का
या अपने ज़ख्म
अपने ही हाथों से सीने का।
अंततः टूटना ही है तुम्हे
फिर क्या बुरा है
यों ही हार जाना ?
वे तुम्हे
कोई भी उपाधि दे सकते हैं और
कोई भी सामान ,
सूखे तालाब में
भर सकते हो तुम मनमाना पानी,
मतलब - बेमतलब
हँस सकते हो ,
बजा सकते हो ताली ,
किसी रस्ते चलते को
दे सकते हो गाली ,
दिन को रात कहो और
रात को दिन
कोई फर्क नहीं पडेगा ।
अंततः टूटना ही है तुम्हे
फिर क्या बुरा है
यों ही हर जाना ?
वह फिर हँसा
और मेरी गर्दन
शिकंजे में कस दबाने लगा ,
चीखने लगीं आकृतियाँ
क्या होगा लड़ाई से ,
क्या होगा
आखिर होगा क्या ?
सुख ... सुख ... सुख
कितना बड़ा सुख !
और एक पेड़ के नीचे
अचानक खडा हो गया मैं ,
चुपचाप
बेझिझक बेच दिया अपने आप को ,
होम दिया अपना हर अंग
ग़ुम हो गए
हर रंग की तलाश में ।
मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011
मंगलवार, 11 जनवरी 2011
व्यस्तता के बाद
जंगल- रेगिस्तान- शहर- आदमी
और जीवन के अनगिन
अजनबी विचारों से भेंट कर
वापस जब लौटा मैं,
चाँदनी
कमरे में सो रही थी।
किसी मंदिर की घंटियों,
बर्फ के नीचे बहते जल
या बारिश की रिमझिम सी
शुद्ध ध्वनि की तरह
वह
बाहर दरख्तों पर छाई थी।
मुझे पता है
जैसे रौशनी
हर चीज़ से उठा देती है पर्दा,
आगे बढ़ जाती है सड़क ,
ठीक वैसे ही
सब कुछ
साफ़ होने लगा है।
शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010
ईप्सित
कभी ऐसा भी हो
कि उगे ही नहीं सूर्य
और देख न सकें आँखें
खिलते हुए अमलतास ।
पास ही कहीं
हवा की तेज़ लहरों में
झनझनाती रहे
कोई गुमनाम सी फली
और मैं महसूस करूँ
एक ध्वनित संस्पर्श ।
बगल में ही
फूट पड़े एक काँस
और कोई अनचीन्ही गौरैय्या
मेरे अंतस की गहराई तक
उसे झुकाती रहे बार-बार।
समूचे शहर को
ढाँप ले एक कोहरा ,
दो समानान्तर रेखाओं के मध्य
उग आये पर्वत
पल भर को हो जाएँ दूर,
एक विचित्र कसमसाहट से
टूट जाये मेरा अहम्।
कुछ तो ऐसा हो
कि शिराओं पर खिले
बर्फ के फूल
झरने लगें अनायास
और लेने लगे साँस
कहीं कोने में पडा अतीत ।
कि उगे ही नहीं सूर्य
और देख न सकें आँखें
खिलते हुए अमलतास ।
पास ही कहीं
हवा की तेज़ लहरों में
झनझनाती रहे
कोई गुमनाम सी फली
और मैं महसूस करूँ
एक ध्वनित संस्पर्श ।
बगल में ही
फूट पड़े एक काँस
और कोई अनचीन्ही गौरैय्या
मेरे अंतस की गहराई तक
उसे झुकाती रहे बार-बार।
समूचे शहर को
ढाँप ले एक कोहरा ,
दो समानान्तर रेखाओं के मध्य
उग आये पर्वत
पल भर को हो जाएँ दूर,
एक विचित्र कसमसाहट से
टूट जाये मेरा अहम्।
कुछ तो ऐसा हो
कि शिराओं पर खिले
बर्फ के फूल
झरने लगें अनायास
और लेने लगे साँस
कहीं कोने में पडा अतीत ।
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
चिंदी-चिंदी कविता
टिप्पणी--- यह कविता भी पिछली कविता " हादसे " की भावभूमि पर ही है। जयपुर से आदरणीय श्री हेतु भारद्वाज तथा प्रिय बन्धु और मेरे मित्र कवि गोविन्द माथुर द्वारा संपादित "अक्सर" पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है ।
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ठीक कहा था उसने
" मुझे क्या बुरा था मरना
अगर एक बार होता ",
रोज़-रोज़ मरने की तकलीफ से
आज़ाद तो होता ।
तीरे नीमकश की
बात है पुरानी
अब वो
सीने पर अडाते हैं त्रिशूल ,
पूछते हैं
जाति-नाम-धर्म,
यही रह गया है
प्यार का मर्म ।
वह भी हतप्रभ है
कहा था जिसने
"उनके हर शूल के बदले
तुम बोते रहो फूल , "
नहीं पता था उसे
कितने फूल
एक त्रिशूल की लिए
होंगे कामयाब ,
इसलिए फिर मर गया
बेचारा कबीर ।
उसकी भी त्रासदी थी
ढूढता था आदमी
कहता था
" आदमी हैं यहाँ भी
आदमी हैं वहां भी , "
आदमी थे ही नहीं ,
तब भी वही थे
अब भी वही हैं
धर्मांध-कट्टर- स्वयंभू
संस्कृति -रक्षक
राम-राम
" ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम । "
क्या हो गया है ,
रोज़-रोज़ मरते जाओ
पर राम-नाम
मरने में भी सत्य नहीं होता,
मैं ही मरता हूँ हर रोज़
पर कोई जनाज़ा नहीं उठता,
कोई मज़ार नहीं होती ,
मेरी यह मौत
कहीं कोई खबर नहीं होती,
मेरी गिनती तक
मृत लोगों में शुमार नहीं होती ।
अब क्या करूँ
किसको पुकारूं ,
गणेश का अनियंत्रित चूहा
अपनी ही जड़ों को कटता है ,
बजरंग का बन गया है दल ,
शिव की है सेना ,
दुर्गा की वाहिनी ,
अब कहाँ रहे देवता
कहाँ हैं आदमी !
मैं पूछता हूँ उस शायर से
वे लोग कहाँ हैं
जो घर बसाते हैं ,
घर बसाते टूट जाते हैं,
ज़ख्म पर मरहम लगाते हैं ?
आदमी सी शक्ल वाले
शास्त्र से माथे पर मेरे
शस्त्र सा आघात करते
कौन हैं ये लोग ?
मेरे खून से क्या गढ़ रहे हैं ?
कौन सा मंदिर या मस्जिद ?
कौन आयेगा वहां ,
कौन जाएगा वहां ,
जिसको मेरा लहू
निर्वात कर देगा ।
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ठीक कहा था उसने
" मुझे क्या बुरा था मरना
अगर एक बार होता ",
रोज़-रोज़ मरने की तकलीफ से
आज़ाद तो होता ।
तीरे नीमकश की
बात है पुरानी
अब वो
सीने पर अडाते हैं त्रिशूल ,
पूछते हैं
जाति-नाम-धर्म,
यही रह गया है
प्यार का मर्म ।
वह भी हतप्रभ है
कहा था जिसने
"उनके हर शूल के बदले
तुम बोते रहो फूल , "
नहीं पता था उसे
कितने फूल
एक त्रिशूल की लिए
होंगे कामयाब ,
इसलिए फिर मर गया
बेचारा कबीर ।
उसकी भी त्रासदी थी
ढूढता था आदमी
कहता था
" आदमी हैं यहाँ भी
आदमी हैं वहां भी , "
आदमी थे ही नहीं ,
तब भी वही थे
अब भी वही हैं
धर्मांध-कट्टर- स्वयंभू
संस्कृति -रक्षक
राम-राम
" ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम । "
क्या हो गया है ,
रोज़-रोज़ मरते जाओ
पर राम-नाम
मरने में भी सत्य नहीं होता,
मैं ही मरता हूँ हर रोज़
पर कोई जनाज़ा नहीं उठता,
कोई मज़ार नहीं होती ,
मेरी यह मौत
कहीं कोई खबर नहीं होती,
मेरी गिनती तक
मृत लोगों में शुमार नहीं होती ।
अब क्या करूँ
किसको पुकारूं ,
गणेश का अनियंत्रित चूहा
अपनी ही जड़ों को कटता है ,
बजरंग का बन गया है दल ,
शिव की है सेना ,
दुर्गा की वाहिनी ,
अब कहाँ रहे देवता
कहाँ हैं आदमी !
मैं पूछता हूँ उस शायर से
वे लोग कहाँ हैं
जो घर बसाते हैं ,
घर बसाते टूट जाते हैं,
ज़ख्म पर मरहम लगाते हैं ?
आदमी सी शक्ल वाले
शास्त्र से माथे पर मेरे
शस्त्र सा आघात करते
कौन हैं ये लोग ?
मेरे खून से क्या गढ़ रहे हैं ?
कौन सा मंदिर या मस्जिद ?
कौन आयेगा वहां ,
कौन जाएगा वहां ,
जिसको मेरा लहू
निर्वात कर देगा ।
सोमवार, 8 नवंबर 2010
हादसे
रोज़ सुबह
अखबार खोलते डरता हूँ,
हादसों की खबर से
टीवी, रेडियो से भी
रहता हूँ दूर।
पहले जो होते थे
अनायास
अब सायास लगते हैं,
पहले लगते थे दूर
अब पास लगते हैं,
घर का दरवाज़ा खटखटाते
ये हादसे।
एक समय था
जब खुलकर हंसता था,
इंसानों के बीच
रहा करता था,
अब मज़हब है पहले
इंसान कहीं नहीं
मंदिर-मस्जिद -गुरूद्वारे सब हैं
इंसान कहीं नहीं,
दीन-दीन का दुश्मन
इंसान कहीं नहीं,
धर्म - धर्म का दुश्मन
इंसान कहीं नहीं।
कहाँ गया इंसान
सवाल बेमानी है,
हर दंगे
घटना -दुर्घटना में
जो मरता है
या मारा जाता है
उसके बारे में फिक्र
बड़ी नादानी है।
यही वज़ह है
अखबारों में खबरें नहीं है
हादसे हैं।
बंद दरवाजों -खिडकियों में
बार-बार
मैं खुद को महफूज़ करता हूँ,
हादसों से
कतराता हूँ , डरता हूँ।
कभी कहीं एक लड़की थी
प्यार से लिपट जाती थी,
भाईजान कहते
जिसकी थकती नहीं थी जुबान,
एक अम्मी थी
जो प्यार से
माँ की तरह आसीसती थी,
एक दोस्त भी था।
कहने को
अब भी वही हैं
पर बीच में
कुछ हादसे आ गए हैं
जिनके लिए
न ज़िम्मेदार वो हैं, न मैं।
हादसों ने
बीच में खींच दी है
शक की जो लकीर
मैं उस शक से घबराता हूँ,
न वह लोग पास आते हैं
न मैं पास जाता हूँ।
अखबार खोलते डरता हूँ,
हादसों की खबर से
टीवी, रेडियो से भी
रहता हूँ दूर।
पहले जो होते थे
अनायास
अब सायास लगते हैं,
पहले लगते थे दूर
अब पास लगते हैं,
घर का दरवाज़ा खटखटाते
ये हादसे।
एक समय था
जब खुलकर हंसता था,
इंसानों के बीच
रहा करता था,
अब मज़हब है पहले
इंसान कहीं नहीं
मंदिर-मस्जिद -गुरूद्वारे सब हैं
इंसान कहीं नहीं,
दीन-दीन का दुश्मन
इंसान कहीं नहीं,
धर्म - धर्म का दुश्मन
इंसान कहीं नहीं।
कहाँ गया इंसान
सवाल बेमानी है,
हर दंगे
घटना -दुर्घटना में
जो मरता है
या मारा जाता है
उसके बारे में फिक्र
बड़ी नादानी है।
यही वज़ह है
अखबारों में खबरें नहीं है
हादसे हैं।
बंद दरवाजों -खिडकियों में
बार-बार
मैं खुद को महफूज़ करता हूँ,
हादसों से
कतराता हूँ , डरता हूँ।
कभी कहीं एक लड़की थी
प्यार से लिपट जाती थी,
भाईजान कहते
जिसकी थकती नहीं थी जुबान,
एक अम्मी थी
जो प्यार से
माँ की तरह आसीसती थी,
एक दोस्त भी था।
कहने को
अब भी वही हैं
पर बीच में
कुछ हादसे आ गए हैं
जिनके लिए
न ज़िम्मेदार वो हैं, न मैं।
हादसों ने
बीच में खींच दी है
शक की जो लकीर
मैं उस शक से घबराता हूँ,
न वह लोग पास आते हैं
न मैं पास जाता हूँ।
गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010
विश्वविद्यालय
एक पतंग
बिना डोर के
हवा में है ,
इस खामखयाली में
कि डोर उसके हाथ है
सब
शून्य में चला रहें हैं हाथ ,
पतंग मुक्त है
हाथ थक गए हैं ।
बिना डोर के
हवा में है ,
इस खामखयाली में
कि डोर उसके हाथ है
सब
शून्य में चला रहें हैं हाथ ,
पतंग मुक्त है
हाथ थक गए हैं ।
गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010
पिता के नाम
लोग कहते हैं
बूढ़े हो गए हैं पिता,
चलते हैं
लडखडाते हैं
गिर भी जाते हैं कभी।
डॉक्टरों की राय हैं,
"कचरा सा भर गया है कुछ
दिमाग की नसों में,
संतुलन नहीं रख पाते वह"
लेकिन पिता तो
सदा से ऐसे थे।
मुझे नहीं पता
माँ ने कहा था,
पहली बार चलते हुए
जब गिरा था मैं
तब भी
लडखडाये थे पिता।
और यह तो याद है मुझे
जितनी देर से
घर लौटता था मैं
उतनी देर
लडखडाते ही रहते थे पिता।
इम्तेहान में
फेल हुआ मैं
तब भी लडखडाये थे पिता।
मेरी शादी, नौकरी
बच्चो के जन्म पर,
अपनी माँ
मेरी माँ की मौत पर,
हम सब की खुशियों
असफलताओं पर,
मेरी बेटी की शादी पर,
उसके माँ बनने पर,
पोते के विदेश जाने पर
पता नहीं क्यों
हर बार
जैसे हैं आज
ठीक ऐसे ही असहज
लडखडाये से दीखे थे पिता।
क्या हुआ,
नया क्या हुआ,
वह पिता हैं
हडबडाते हैं ,
लडखडाते हैं ,
लेकिन पहले की तरह
हर बार
संभलना - संभालना
उनसे हो नहीं पाता अब।
जब से पिता हो गया हूँ मैं
मेरा लडखडाना भी
पिता में ही शामिल हो गया है।
बूढ़े हो गए हैं पिता,
चलते हैं
लडखडाते हैं
गिर भी जाते हैं कभी।
डॉक्टरों की राय हैं,
"कचरा सा भर गया है कुछ
दिमाग की नसों में,
संतुलन नहीं रख पाते वह"
लेकिन पिता तो
सदा से ऐसे थे।
मुझे नहीं पता
माँ ने कहा था,
पहली बार चलते हुए
जब गिरा था मैं
तब भी
लडखडाये थे पिता।
और यह तो याद है मुझे
जितनी देर से
घर लौटता था मैं
उतनी देर
लडखडाते ही रहते थे पिता।
इम्तेहान में
फेल हुआ मैं
तब भी लडखडाये थे पिता।
मेरी शादी, नौकरी
बच्चो के जन्म पर,
अपनी माँ
मेरी माँ की मौत पर,
हम सब की खुशियों
असफलताओं पर,
मेरी बेटी की शादी पर,
उसके माँ बनने पर,
पोते के विदेश जाने पर
पता नहीं क्यों
हर बार
जैसे हैं आज
ठीक ऐसे ही असहज
लडखडाये से दीखे थे पिता।
क्या हुआ,
नया क्या हुआ,
वह पिता हैं
हडबडाते हैं ,
लडखडाते हैं ,
लेकिन पहले की तरह
हर बार
संभलना - संभालना
उनसे हो नहीं पाता अब।
जब से पिता हो गया हूँ मैं
मेरा लडखडाना भी
पिता में ही शामिल हो गया है।
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