मेरे सामने फैला है एक सैलाब
तुम उसे कुछ भी कह सकते हो।
मेरे व्यक्तित्व की परछाइयौ
काँपती हैं जिसमे लगातार
और मैं
अपने भीतर उफनते काले झाग
और इस देश के भयावह इतिहास से
अपरिचित हो जाता हूँ यकायक।
किसी तेज़ हथियार की तरह
पसलियाँ चीर कर
गुज़र जाते हैं सवाल,
सपनों की तरह
जिनके अर्थ उल्टे- सीधे हैं।
तब इसी सैलाब के वक्ष पर
उतरती है एक नाव ,
आकृतियाँ स्त्रियों और पुरुषों की
जिसमे धुंए की भांति भरी हैं,
मेरा दम घुटता है
लेकिन अपने गुस्से के लिए
सही शब्द की तलाश करते -करते
मैं जड़ हो जाता हूँ ,
लगता है
अब मैं कुछ नामालूम अस्थियों में
जीवित रहूँगा ।
भय से कांपते बहुत से हाथ
उधार लिए काठ के सहारे
खड़ा करते हैं एक वृक्ष
जिसके सिर पर तीन पत्तियाँ हैं
जनतंत्र , शासन , विरोध
और जिसकी हर डाल पर उल्टे लटके लोग
संक्रांति का सर्कस करते हैं ।
धीरे -धीरे
उनकी हथेलियों में उग आते हैं गहरे घाव
जिन्हें वे धूप में खुला छोड़ देते हैं
सुखाने के लिए
और जब - जब बदलता है मौसम
या चदते हैं बाज़ार भाव
सारे के सारे घाव
कुछ समृद्ध चेहरों पर
चिपक जाते हैं ।
उनके घावों से बूँद -बूँद टपकता खून
सैलाब को लाल कर देता है ,
लाल पानी पीकर
वे लौटते हैं अपने घर
जिसके द्वार पर
खूंखार आदिम पैरों के निशान हैं ,
बाहर खड़े ही खड़े
वे हवा में फेंक देते हैं एक निरर्थक सा प्रश्न
"यह क्या हो रहा है
आखिर यह हो क्या रहा है
कि हर व्यक्ति
किसी दूसरे के घर में घुस गया है ? "
दिशाओं से टकरा कर
प्रश्न चिंदियों में बिखर जाता है ,
साहस के पर्वत
छोटे होते -होते
पुतलियों में पैठ जाते हैं ,
भय की इमारत
कन्धों पर खड़ी होने लगती है ।
वे रेत के ढेर में छुपा लेते हैं अपनी आँखें
और दार्शनिक या संत या नेता के
लबादे ओढ़ लेते हैं ,
आत्मारोहण बुनियादी झूठ में बदल जाता है ,
सैलाब उसी क्षण से
सफ़ेद होने लगता है ।
मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010
रविवार, 26 सितंबर 2010
अपने ब्लॉग के बारे में
क्या कहूँ अपने बारे में। एक ज़माना गुज़र गया कविता लिखते हुए। कुछ व्यंग्य और कहानियाँ भी लिखीं। जब पढ़ता था तो नाम और दाम दोनों का शौक था। उस समय लहर, वातायन, कल्पना, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, ज्ञानोदय अदि सभी प्रमुख-अप्रमुख पत्र -पत्रिकाओं में पहले वसंत और बाद में वसंत वसु के नाम से छपा भी| बाद में धीरे -धीरे प्रकाशन से मोहभंग होने लगा या यों कह लें कि रूचि नहीं रही। लिखना विवशता बन गया इसलिए लिखता हूँ | अभी कुछ अरसा पहले, बहुत दिनों बाद , "अक्सर" में आदरणीय हेतु भारद्वाज जी और मित्र गोविन्द माथुर ने "चिंदी-चिंदी कविता" नाम से एक रचना छापी थी। वसु से मुझे कालांतर में कुछ रूमानी सा बोध अधिक हुआ इसलिए इसे छोड़ कर बसंत जैतली के अपने नाम से लिखने लगा। जब जयपुर से दैनिक भास्कर शाया हुआ तो करीब सात माह तक उसमे जीवन -दर्शन लिखा लेकिन उन लोगों से निभा नहीं सका। १९७० से २००५ तक राजस्थान विश्व विद्यालय के संस्कृत विभाग में अध्यापन। यहीं के नाट्य विभाग से उसकी स्थापना के काल से ही जुडा रहा था इसलिए सेवा निवृत्त होने के बाद से वहीँ पढ़ा रहा हूँ। अब वसंत या वसंत वसु को कुछ पुराने दोस्तों के अलावा कोई नहीं जानता इसलिए प्रकाशन के लिए कुछ कहीं भेजता नहीं| कविताओं के दो संकलनो से अधिक सामग्री हो गयी है| प्रकाशक तलाश रहा हूँ पर जब नाम ही खो गया तो छापेगा कौन ? हो सकता है की ये कवितायेँ
मेरे साथ ही स्वाहा हो जाएँ । यहाँ ब्लॉग इसीलिए शुरू किया की कम से कम कुछ कविताओं से, रूचि रखने वाले, लोग परिचित हो लें । बस इतना ही ।
मेरे साथ ही स्वाहा हो जाएँ । यहाँ ब्लॉग इसीलिए शुरू किया की कम से कम कुछ कविताओं से, रूचि रखने वाले, लोग परिचित हो लें । बस इतना ही ।
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
संवाद
कल एक फ़ोन किया
वहाँ
जहाँ जाना चाहते हैं सभी,
वहीं रहता है मेरा बेटा |
"हलो पापा"
सुनते ही कहा
आज बनाया था
तुम्हारी पसंद का खाना,
अच्छा बना था
इसलिए याद आई बहुत |
"अपनी -अपनी किस्मत है पापा "
उसने कहा
"मेरी किस्मत में नहीं है
आपके हाथ का खाना |"
मैं चुप रहा
कैसे कहता उससे
कि क्या कुछ नहीं है
मेरी किस्मत में .
वहाँ
जहाँ जाना चाहते हैं सभी,
वहीं रहता है मेरा बेटा |
"हलो पापा"
सुनते ही कहा
आज बनाया था
तुम्हारी पसंद का खाना,
अच्छा बना था
इसलिए याद आई बहुत |
"अपनी -अपनी किस्मत है पापा "
उसने कहा
"मेरी किस्मत में नहीं है
आपके हाथ का खाना |"
मैं चुप रहा
कैसे कहता उससे
कि क्या कुछ नहीं है
मेरी किस्मत में .
शनिवार, 18 सितंबर 2010
विसर्जन
जब मेरे चरों ओर
एक शून्य घिर आता है
मैं उसके कई टुकड़े तोड़
आस- पास खड़े
लोगों पर फ़ेंक देता हूँ
ताकि वह जानें
कि आसमान क्या है
और कितना रह जाता है
नोच लिया जाने पर ...... फैलाव .
एक शून्य घिर आता है
मैं उसके कई टुकड़े तोड़
आस- पास खड़े
लोगों पर फ़ेंक देता हूँ
ताकि वह जानें
कि आसमान क्या है
और कितना रह जाता है
नोच लिया जाने पर ...... फैलाव .
सोमवार, 13 सितंबर 2010
सूर्यास्त
बीत गया दिन,
खिड़की के शीशे में
आयत सी उतर रही शाम|
यादों के झुरमुट में
अभी - अभी डूबेगी
बिसराई बातों सी
धुंधलाती शाम |
खिड़की के शीशे में
आयत सी उतर रही शाम|
यादों के झुरमुट में
अभी - अभी डूबेगी
बिसराई बातों सी
धुंधलाती शाम |
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