मंगलवार, 10 जनवरी 2012

उमराव जान

कैसी थी,
कैसी दीखती थी,
कैसी रही होगी वह
जिसके बारे में
चर्चे होते हैं आज
सदियों के बाद भी |

कहते हैं
वह सुन्दर थी,
कितनी सुंदर थी
रीतिकाल की नायिका सी
या तिलोत्तमा
कालिदास की ?
कैसा रहा होगा
उसका रंग,
दूध सा गोरा
या कृष्ण सा श्याम ?

क्या इस दुनिया को
चकित हरिणी सी बड़ी-बड़ी आँखों से
निहारती होगी वह,
क्या अनारदानों सी
समतल रही होगी
उसकी दन्तावली
और बिम्बाफल से लाल होंठ,
क्या किसी भंवर सी गहरी थी
उसकी नाभि,
क्या उरोजों का भार
किंचित झुकाता था
उसकी देहयष्टि,
क्या श्रोणी-भार ने
अलसगमना बनाया था उसे ......
पता नहीं |

लेकिन यह सवाल
सालता है लगातार
कि अपने घर से दूर
कहीं और रोप दी गई
उस लड़की को
कैसा लगता था
जिसने नहीं जाना था बचपन,
भाई से
झगड़ नहीं पाई थी,
ज़िद नहीं कर पाई थी
अम्मी या अब्बू से,
बस बचपन से जवानी तक
सीखती रही गुर
नाच- गाना
तौर-तरीके
एक मशहूर रक्कासा
या तवायफ़ बन जाने के |

कहते हैं
एक नवाब और एक डाकू से
प्रेम किया था उसने,
तो इतना तो तय है
कि एक दिल तो धडकता था
सीने में उसके,
शायद इसी दिल ने
शायरा बनाया था उसे
लेकिन वे प्रेमी
प्रेम किसे करते थे ....
उमराव जान को
या उसकी देह को ?

यह भी नहीं पता मुझे
कब तक ज़िन्दा रही वह,
पर यह मालूम है
किसी एक दिन
लुटी -पिटी सी
वह पहुंची थी अपने घर
और वहाँ से
शिला बन कर लौट गई थी वापस
लुटे-पिटे उसी कोठे पर |

सुनते हैं
फ़ैजाबाद था
उसका अपना घर,
वही जगह
जिसकी बगल में
विराजे हैं रामलला,
कहते हैं
शिला बन गई
अहिल्या के तारक थे वह
लेकिन यह
महज़ एक कथा है,
वास्तव में किसका उद्धार करते हैं वे
कौन जानता है
लेकिन यह जानते हैं सब
कि उसको नहीं तारा उन्होंने
जिसका नाम था
उमराव जान |

14 टिप्‍पणियां:

  1. उमराव जान की जिंदगी की तमाम तहें बड़ी नाजुकी से उधेड़ती यह कविता उनके बहाने एक सामन्ती समाज में औरत की ज़िंदगी की तमाम विडम्बनाएँ बयान करती है..

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  2. उमराव जान एक ऐसा नाम है जो अंदर तक व्यथित करता चला जाता है ... आपकी लेखनी ने उसके जीवन में घटित घटनाओं को बड़े हौले से अभिव्यक्त किया है अहिल्या बन गयी स्त्री का उद्धार करने वाले राम पर भी अच्छा कटाक्ष है.... आज भी जाने कितनी उमराव जान हैं जो ऐसी ही किसी पीड़ा से पीड़ित होंगी...लेकिन कोई राम नहीं ..

    आभार और बधाई. सर...

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  3. उमराव जान पर यहाँ भी कुछ...

    http://gita-pandit.blogspot.com/2012/01/blog-post_09.html

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  4. Dekha aur achha laga. Meri kavita kendra me sirf umaraao jaan hai aur yahan kai sandarbhon me use joda-dekha gaya hai. Drishti alag hai.is kavta ke ansh padhavaane ke lye dhanyavaad.

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  5. Ek vaishishtta bhari sadhee huee Rachns. saarthak, yathaarthvadee aur pripaky abhivykti...yah rachana charcha ke liye saikdon darvaze khole huye hai...yah rachna khud-b-khud Rachnakar ke pripakyata aur anubhav ka saboot...ek sashakt hastaakshar...abhi bas itnaa hi...shesh bad men..

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  6. आपकी कविता के केन्‍द्र में उमराव जान है और उमराव जान हो अहिल्‍या हाशिये पर रही हमेशा...केन्‍द्र में रहे राम...केन्‍द्र में रहे नवाब...केन्‍द्र में रहे उमराव को उमराव जान तक ले जाने वाले...जो केन्‍द्र से हट गया है, उसे सही जगह लाती है कविता और यही उसकी सार्थकता है, संवेदना देह से आत्‍मा का सफर करती है...

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  7. Kailash Wankhede
    ------------------
    mujhe lagta ek bar fir se likhi ja sakti hai .sidhi sapat ho gai .jabki kavita me gunjaish hai .
    aap bura to nahi man gaye,
    Tuesday at 11:43pm

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  8. Basant Jaitly Bura maanane ki kya baat hai bhahi , main to khud sahi tippani mangi thi. Vichaar karoonga

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  9. Lakshmi Sharma आपकी कविता में मार्मिक भावाभिव्यक्ति और प्रांजल शब्द जिस करूँ कथा को कहते हैं उसमे सर्वाधिक प्रभावी है अहल्या के मिथक से उसकी त्रासद जडता को जोडना.

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  10. Govind Mathur ----Aisi anek Nariyan hai jo taari nahi gai. Itihaas me ek umrao Jan hi nahi hai, kai umrao Jan hue hai jinke baare me hamen nahi malloom.

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  11. Basant Jaitly ----Umarao jaan sabhi ka prateek hai aur ye panktiyaan--- लेकिन यह
    महज़ एक कथा है,
    वास्तव में किसका उद्धार करते हैं वे----- un sabhi ke baare me tippani hai.

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  12. वंदना शर्मा
    ----------
    udaas karti hui marmik kavita hai ..soch me daal dene waal badhai aapne bahut samvedan sheel likha hai

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  13. behad marmik he basant ji umrao jan ke dard ko ji liya he apane, kalidas ki nayikao me se bhi kai umrao jan si thi, kabhi unhe bhi to hindi pathako ke samane laaye

    lajjavab

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  14. I simply loved this poem... very touching... Its the bitter truth of a woman's life... bitterly, and so beautifully put forth... I have written something similar not on umrao jaan's but on a prostitute's life glorified but in the dungeons... its the same paradox.. and thats why i loved it.. and thats what life is..!!!

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