बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

आदतन

औरतें
जब होतीं हैं दफ्तर में
तो काम पर ही नहीं होतीं,
कभी भी आ सकता है
उनका फोन
खाना खा लेने,
समय पर दवा लेने,
या लौटते समय
फेहरिस्त का सामान लाने की
हिदायत के साथ |

घर में
सुबह का खाना निबटने के साथ
शुरू हो जाती है उनकी
रात के खाने की चिंता,
रसोई में
वे खाना ही नहीं पकातीं
सरे घर को
भर देतीं हैं
मसालों की गंध से,
लेकिन शाम को
गर खटकते हैं
मर्दों के गिलास
तो टोकती ज़रूर हैं,
यह जानते हुए भी
कि इस मसले पर
सालों से
अनसुनी करते रहे हैं वह |

औरतें
जब होती हैं बच्चों के बीच
तो ज़रूरी नहीं
कि करा रहीं हों होम वर्क
या तैयार कर रहीं हों उन्हें
किसी फंक्शन
या स्कूल के लिए,
वे यह कर रहीं हों तो भी
मुसलसल चलती रहती हैं
उनकी हिदायतें
यह जानते हुए भी
कि आखिरकार मानेंगे नहीं बच्चे |

औरतें
जब होती हैं
सहेलियों के बीच
तो चुहलबाज़ी ही नहीं करतीं,
उनकी बातों में होता है
अपने सहित
सारे जाने-अनजानों का दुःख-दर्द
( लोग इसे गॉसिप कहते हैं )
यह जानते हुए भी
कि कर कुछ नहीं सकतीं हैं वे |

औरतें जब होती हैं
अपने पति नुमा मर्द के साथ
तो बस वहीँ नहीं होतीं,
वे सुनाती हैं
अपने दिन भर की बातें
यह जानते हुए भी
कि पति कि हूँ या हाँ
नहीं है
उसके सुनने का सबूत |

दरअसल
आदमी की ज़रूरत
अक्सर नहीं होती
औरत की दरकार,
आदमी
जब तलाशता है
अपनी पत्नी या प्रेमिका की
कहीं खो गई देह-गंध,
औरत उस समय तक
बंट चुकी होती है
अनेक अबूझ रिश्तों में
इतने चुपचाप
कि आदमी को इसकी
हवा भी नहीं लग पाती |

आदमी के लिए
आश्चर्य होती है औरत
और ताउम्र
वही बनी रहती है
आदतन |
.




13 टिप्‍पणियां:

  1. Rati Saxena bahut acchi kavita he basant ji, kritya ko dekar yahan dalate na...koi bat nahi fir dijiye

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  2. yah kavita mujhe behad acchi lagi, bantati hui ourat ko apane khoob accha chitra diya basant ji, badhai

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  3. DrAnita Jain---- very real..a man's own story n reality about women...

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  4. Mohan Shrotriya --- वाह. औरत आश्चर्य बनी रहती है, ताउम्र, मर्द के लिए. क्या निष्कर्ष है!

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  5. Rekha Saksena---- bahut achchi kavita.padhte hue laga haan eisa hi to hota rahta hai .

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  6. सुनीता सनाढ्य पाण्डेय --- बहुत ही सही और सटीक व्याख्या नारी जीवन की, सर...

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  7. Rafat Alam
    ------------
    ‎...आदमी
    जब तलाशता है
    अपनी पत्नी या प्रेमिका की
    कहीं खो गई देह-गंध,
    औरत उस समय तक
    बंट चुकी होती है
    अनेक अबूझ रिश्तों में
    इतने चुपचाप
    कि आदमी को इसकी
    हवा भी नहीं लग पाती |बहुत खूब विश्लेषण करती कविता है साहिब

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  8. Prem Chand Gandhi--- बेहद प्रभावी और स्‍त्री के गोपन संसार की संवेदनशील तरीके से पहचान करती कविता है यह। बधाई बंसत दादा। अंतिम पंक्तियां बेहद सुंदर हैं.... आदमी के लिए
    आश्चर्य होती है औरत
    और ताउम्र
    वही बनी रहती है
    आदतन।

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  9. Leena Malhotra--- ha ha achhi lagi kavita.. khush hoon basant ji isliye hansi..

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  10. Vinod Bharadwaj---- KAVITA DIKHA RAHI HAI EK AURAT YA KI TAMAM AURATEIN JO HAR HAAL MAIN TA UMAR MAA BANI RAHTI HAIN

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  11. Rituparna -----Rituparna, DrRaju and 14 others
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    11:46pm
    औरत उस समय तक
    बंट चुकी होती है
    अनेक अबूझ रिश्तों में
    इतने चुपचाप
    कि आदमी को इसकी
    हवा भी नहीं लग पाती |

    आदमी के लिए
    आश्चर्य होती है औरत
    और ताउम्र
    वही बनी रहती है
    आदतन . behtareen...yeh kavita stri ke manobhavo ko bahut sahajta se vyakt karti hai... bade mamuli si dikhne wale ghatna-kram ke pichhe ka manovigyan aksar utna saral nahin hota... jitana praya dikhata hai... iss kavita ko kalam-baddh karne ke liye punnh badhayi…

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  12. आदतन ...बहुत सहजता के साथ लिखी गयी रचना...सहजता के साथ आत्मसात हो गयी....

    बधाई आपको ..

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  13. एक औरत की जिंदगी का सरल शब्दों में सटीक चित्रण....सही लिखा है आपने एक औरत अपने जीवन में कई टुकड़ों में बंटी रहकर भी हर टुकड़े को भरपूर जीती है.....कोई आश्चर्य नहीं कि इसमें संतुलन साधने में वह बहुत माहिर होती है और वे सब कम आदत की तरह सहजता से होते भी जाते हैं.....ठीक उसी तरह जैसे सूरज रोज निकलता या अस्त होता है......सुंदर कविता के लिए बधाई दादा.......

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