शनिवार, 9 जुलाई 2011

समापन

हमारे स्पर्श से परे हटने को
ऊंचा हो जाता है आकाश,
तट पर बिखरी
सीपियाँ उठाने बढे हाथों में
रेत भी नहीं छोड़ता समुद्र ,
लेकिन हर क्षण
ज़िंदगी के बेतरतीब क्षणों का जुलूस
एक चौराहा पार कर लेता है.

पीछे सड़ते रहते हैं
अनगिनत शव ,
सब कुछ को नकार
सिगरेट के साथ कॉफ़ी पीते
जोर से बहसते हैं बुद्धिजीवी,
कोई अरस्तु पैदा नहीं होता.

झपझपाने लगती हैं
बूढ़े दुर्ग की आँखें,
गूंजने के बाद
थरथरा कर थम जाता है
अजाना अट्टहास ........ खामोशी
जिसका अर्थ समझने में असफल
बहुतेरी आकृतियाँ
कर लेती हैं आत्महत्या.

झरते हैं उड़ते कबूतरों के पंख
इतनी तीव्रता से
कि घबराकर
आसमान पर
काले कपडे तान देते हैं लोग ..... अन्धकार,
किसी ईसा के जन्मने की संभावना में
सम्भोग करते हैं कुंवारे जिस्म,
बहुत दिनों बाद भी
कोई मरियम गर्भवती नहीं होती,
उभरता है खिजलाया प्रतिबन्ध
' अब सलीब का ज़िक्र नहीं होगा.'

परिवर्तन के नाम पर
दौड़ते हैं
कामनाओं के जंगली अश्व,
मुक्ति के लोभ में
गले में भारी पत्थर बांधे
चिपचिपाती सड़क पर
घिसटती हैं टूटी संज्ञाएँ,
अपना दाय सौंपने को.

तभी कहीं कौंधती है रौशनी,
खाली हाथों का अहसास कर
हांफने लगते हैं
पराजित युग के बुत....... प्यास
दूर चमकती है
नीली धार पानी की.

अचानक पत्थरों को फेंक
चीखने लगते हैं
दूरी से अनजान बुत,
इसी समय
इसे महसूस कर
नकारता है पानी की आवश्यकता एक व्यक्ति
और फिर
धर्म-राजनीति-साहित्य-सैक्स पर
एक साथ बोलता हुआ
नंगा हो जाता है,
अपनी बातों को नए लेबिल से सजा
बांटता है लोगों के बीच.

एक अदना सा व्यक्ति
रोकता है सबको
" ठहरो , पानी की ओर चलो ",
नई उपलब्धि की खुशी में
बहुत से हाथ उसकी ह्त्या कर देते हैं,
मर जाता है मुक्तिबोध.

हवाओं में
बिखरता है शीशा,
भरभरा कर
ढह जाते हैं अनगिन मकान,
खंडहरों में
गूंजती है अचीन्ही ध्वनियाँ,
चक्कर काटते हैं
चीत्कारते गिद्ध,
कांपने लगते हैं
बहुत से भयभीत धड,
अभिशप्त हो जाती है
पूरी शताब्दी,
किसी दूसरे लोक की खोज में
निकल पड़ती है अग्नि
और कोई मातरिश्वा
उसे वापस नहीं लाता.

5 टिप्‍पणियां:

  1. कविता पढ़ते हुए सिहरन सी होती है. कितना क्रूर है हमारे समय का सत्य!उस अग्नि की खोज में निकलना होगा हमें ....

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  2. तभी कहीं कौंधती है रौशनी,
    खाली हाथों का अहसास कर
    हांफने लगते हैं
    पराजित युग के बुत....... प्यास
    दूर चमकती है
    नीली धार पानी की.


    .....................समय के सत्य को उकेरती बेहद सार्थक रचना.....आभार ..

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  3. बहुत गहरी गंभीर कविता है नवान्न प्रतीकों से सजी हुई.यह कविता बार बार पढ़ने के काबिल है.जितनी बार पढ़ी जाये कुछ नए अर्थ खुलेंगे.
    पीछे सड़ते रहते हैं
    अनगिनत शव ,
    सब कुछ को नकार
    सिगरेट के साथ कॉफ़ी पीते
    जोर से बहसते हैं बुद्धिजीवी,
    कोई अरस्तु पैदा नहीं होता.
    मथने वाली इन पंक्तियों के बारे में क्या कहूँ? जबरदस्त है.
    जोर से बहसते हैं बुद्धिजीवी- में 'बहस करते' का लाघव प्रस्तुत करता 'बहसते'शब्द-प्रयोग बिलकुल अछूता लगा. शायद, यह शब्द बसंत साहब का अपना गढा हुआ है.हिंदी संसार को एक नया शब्द देने के लिए भी बसंत जी बधाई और आभार के पात्र हैं.

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  4. एक अदना सा व्यक्ति
    रोकता है सबको
    " ठहरो , पानी की ओर चलो ",

    आपको पढकर और पढने का लोभ संवरण नहीं हो सकेगा..निरंतर रहिये.

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  5. gahri baat.. thah paane ke liye kai dubkiyan lagaani hongi.. झपझपाने लगती हैं
    बूढ़े दुर्ग की आँखें,
    गूंजने के बाद
    थरथरा कर थम जाता है
    अजाना अट्टहास ........ खामोशी
    जिसका अर्थ समझने में असफल
    बहुतेरी आकृतियाँ
    कर लेती हैं आत्महत्या. poori kavita ko hi chnhit karna hoga. bahut sundar.

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