मंगलवार, 12 जुलाई 2011

समय की साज़िश के बाद

कुछ भी संज्ञा हो सकती है
मेरे और उस नगर के संबंधों की
जिसकी दीवारें
आँखों में घुले सपनों से
आ- आकर टकराती हैं,
अपने आप को पहचानने से
इनकार कर देता हूँ मैं.
शहर से बेतरह
नफरत हो जाती है |

इस सब से अलग
मेरा परिवेश
हाथों में सूखे कनेर का गुच्छा लिए
ढहते दुर्ग की प्राचीर पर
धुंए के छल्ले बनाता रहता है |

अन्दर कहीं गहरे दबा
विद्रोही चेतना का कोई अंश
और गहरे पैठ कर
सिर्फ चर्चाएँ करता है,
किसी अग्निपक्षी के पंख
अपनी ही आग से
झुलसते रहते हैं |

रक्त भीगे हाथों से
घोंघे और सीपियाँ बटोरता
एक व्यक्ति,
मन भर कर
अपने आचरण का रस पी लेने के बाद,
रंग-बिरंगे गुब्बारे फोड़ता हुआ
किसी गहरे गर्त में
कूद पड़ता है |

घिर आता है चारों ओर
बारूद के महीन कणों सा
गहरा कुहासा
और मैं
शब्दों को अर्थ
और अर्थों को शब्द देने की प्रक्रिया में
भूल जाता हूँ
अपना व्याकरण |

सारे वर्तमान को
कल्पित यज्ञ में होम कर
रक्तबीज आशा की राख में
नेवलों की तरह
लोटने लगते हैं लोग
" किसी का भी बदन
सुनहरा नहीं होता | "

क्रमशः
थरथराता है आकाश
बढ़ता है अन्धकार,
रौशनी...... रौशनी
चीखता है
हताश चेहरों का हुजूम,
हज़ार टुकड़ों में बंट गया सूर्य
सिर्फ पश्चिमी देशों पर उगता है |

व्याप गए अन्धकार का
लाभ उठाता है
मेरा व्यभिचारी आदिमानव
फिर
पाप न करने की
कसम खाता हुआ
भीड़ में खो जाता है |

मजबूर पिताओं का दल
टोकरियाँ भर-भर कर
ढोता रहता है
अपने बेटों की अस्थियाँ,
जीवन और मृत्यु
चुपचाप
मायने बदल लेते हैं,
हथेलियों की
उलझी- सुलझी रेखाएं
किसी निश्चित भवितव्य की
सूचना नहीं देतीं |

अब न यह तुम्हे पता है
न मुझे
कि समय की इस साज़िश के बाद
अस्तित्व के लिए बैसाखियाँ
और बैसाखियों के लिए अस्तित्व
कौन सी दिशा बांटेगी |

1 टिप्पणी:

  1. kavita ka vistaar prbhavit karta hai... sv se shuru hokar deshkal ki seemao se nikal kar kavita manviyta aur uski trasdi ka shok manati hai. aur ek prashn hava me tairta rahta hai jo asha ka prateek hai. sadhuvaad.

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