मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

आत्मारोहण

मेरे सामने फैला है एक सैलाब
तुम उसे कुछ भी कह सकते हो।

मेरे व्यक्तित्व की परछाइयौ
काँपती हैं जिसमे लगातार
और मैं
अपने भीतर उफनते काले झाग
और इस देश के भयावह इतिहास से
अपरिचित हो जाता हूँ यकायक।

किसी तेज़ हथियार की तरह
पसलियाँ चीर कर
गुज़र जाते हैं सवाल,
सपनों की तरह
जिनके अर्थ उल्टे- सीधे हैं।

तब इसी सैलाब के वक्ष पर
उतरती है एक नाव ,
आकृतियाँ स्त्रियों और पुरुषों की
जिसमे धुंए की भांति भरी हैं,
मेरा दम घुटता है
लेकिन अपने गुस्से के लिए
सही शब्द की तलाश करते -करते
मैं जड़ हो जाता हूँ ,
लगता है
अब मैं कुछ नामालूम अस्थियों में
जीवित रहूँगा ।

भय से कांपते बहुत से हाथ
उधार लिए काठ के सहारे
खड़ा करते हैं एक वृक्ष
जिसके सिर पर तीन पत्तियाँ हैं
जनतंत्र , शासन , विरोध
और जिसकी हर डाल पर उल्टे लटके लोग
संक्रांति का सर्कस करते हैं ।

धीरे -धीरे
उनकी हथेलियों में उग आते हैं गहरे घाव
जिन्हें वे धूप में खुला छोड़ देते हैं
सुखाने के लिए
और जब - जब बदलता है मौसम
या चदते हैं बाज़ार भाव
सारे के सारे घाव
कुछ समृद्ध चेहरों पर
चिपक जाते हैं ।

उनके घावों से बूँद -बूँद टपकता खून
सैलाब को लाल कर देता है ,
लाल पानी पीकर
वे लौटते हैं अपने घर
जिसके द्वार पर
खूंखार आदिम पैरों के निशान हैं ,
बाहर खड़े ही खड़े
वे हवा में फेंक देते हैं एक निरर्थक सा प्रश्न
"यह क्या हो रहा है
आखिर यह हो क्या रहा है
कि हर व्यक्ति
किसी दूसरे के घर में घुस गया है ? "

दिशाओं से टकरा कर
प्रश्न चिंदियों में बिखर जाता है ,
साहस के पर्वत
छोटे होते -होते
पुतलियों में पैठ जाते हैं ,
भय की इमारत
कन्धों पर खड़ी होने लगती है ।

वे रेत के ढेर में छुपा लेते हैं अपनी आँखें
और दार्शनिक या संत या नेता के
लबादे ओढ़ लेते हैं ,
आत्मारोहण बुनियादी झूठ में बदल जाता है ,
सैलाब उसी क्षण से
सफ़ेद होने लगता है ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. this is truly a beautiful expression of that sailab, given the todays scenario, that is dormant inside every man, but just that you gave it words and expressed it soo beautifully... and only you could have done it this beautifully and deeply. 'Deep'- something you've always been... ! personally to me i loved the expression....."किसी तेज़ हथियार की तरह
    पसलियाँ चीर कर
    गुज़र जाते हैं सवाल,
    सपनों की तरह
    जिनके अर्थ उल्टे- सीधे हैं।"...... and so many more ... like......
    "लेकिन अपने गुस्से के लिए
    सही शब्द की तलाश करते -करते
    मैं जड़ हो जाता हूँ ,
    लगता है
    अब मैं कुछ नामालूम अस्थियों में
    जीवित रहूँगा ।"
    I have always saluted the depth in you.... :))))

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  2. आपने बहुत खूबसूरती से परिद्रश्य को काव्य में ढाला है...बधाई!
    क्या बात कही है...फैज़ याद आ गए, जो "मुझ से पहली सी मुहब्बत..." में खून और मवाद से समाज की असलियत का खाका खींचते हैं..."बूँद-बूँद टपकता खून सैलाब को लाल कर देता है..."- आपको लाल सलाम!

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