शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

अमृत्यु

यह सच है
कि भारी आवाजों के बीच
टूट गयी थी रात की खामोशी
पर क्यों
आखिर क्यों मान लिया तुमने
उन आवाजों से अपना सम्बन्ध।

क्या तुम्हारे पास नहीं थी
कोई उफनती नदी
या वह सूख गयी इतनी जल्दी
कि कमजोरी - घबराहट के नीचे दबे
तुम हर आहट पर सहमते रहे,
और मैं
किसी अज्ञात नाटक में फँस कर
संवादों के द्वारा
तुम्हे समझाता रहा ।

कितना विचित्र था वह क्षण
मैं अपने सामने खडा था
लोग हंस रहे थे
नहीं पता था उन्हें
दोस्ती की भाषा दूसरी होती है
दुश्मनी की दूसरी ।
जाओ , अब तुम जाओ
और चुन -चुन कर
ह्त्या कर दो उन सपनों की
जो तुम्हारी खुली आँखों में बंद हैं ।

नहीं, अब अभिनय नहीं करूंगा मैं
इससे तो अच्छा है
पेट में तपती आग से तंग आकर
खा लेना अपना ही मांस
और भुला देना वह काला सा शून्य
जो कन्धों पर झुका है ।

लेकिन तुम नहीं करोगे यह सब,
( सहोगे भी नहीं )
सिर्फ दूसरों की ज़मीन पर खड़े होकर भाषण दोगे
या विस्थितियों के समुद्र में
चुपचाप सौंप दोगे अपनी चेतना
लहरों को ।

मैंने देखा है
मुहँ से झाग और नारे
साथ -साथ उगलता हुआ जुलूस
जब भी गुज़रा है
तुम एक चालाक नेता की तरह
उसके पीछे चले हो निःशब्द
और जब सड़क हावी होने लगी है
तुम लोमड़ी की तरह चक्कर काट कर
गायब हो गए हो ।

हर बार
घटनाओं के जाल में फंसते समय
बहस का रुख
तुमने मौसम या बाज़ार भाव की ओर
मोड़ दिया है,
जाओ अब तुम जाओ
और किसी स्याह किले की दीवारों पर
पटकते रहो अपना सर ।

मुझे नहीं पता था
इतना कातर है तुम्हारा आसमान
कि हताश होने पर
तुमसे भी नीचा हो जाता है ,
तुम किसी कंधे पर
टिका देते हो अपना माथा
और वह किसी अंधी गुफा की
दीवार टटोलता रहता है |

नहीं , मैं नहीं करूंगा यह सब
सहूंगा भी नहीं,
जिनका जीवन संगीत बन चुका हो
वे सहें ,
मुझे तो गिनने हैं
उस मगरमच्छ के दांत
जो जीवन की लहरों पर
मौत बन कर नाचता रहता है ।

लोग हसेंगे ..... हँसे ,
सभाएं करें ,
मन चाही धुन पर
दुहराते रहें राष्ट्रगीत ,
उन्हें नहीं पता
संज्ञाओं में जीना
मैंने छोड़ दिया है ,
दिवास्वप्नों से
मुझे चिढ है ।

पर तुम जाओ ...... जाओ
और किसी ऊँचे पहाड़ से
लुढ़का दो स्वयं को
गेंद की तरह ।

मुझे पता है
अधिक से अधिक
किसी बेहूदा इश्तेहार की शक्ल में
तुम दीवारों पर चिपक जाओगे
मरोगे नहीं,
पर तुम जाओ ...... जाओ
और कम से कम
अपने खून का रंग जान लो ।





2 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय बसन्‍त जी । आपकी कविता इतनी अच्‍छी लगी कि मैं शब्‍दों में व्‍यक्‍त नहीं कर सकता। मुझे ताज्‍जुब हो रहा है कि इतनी खूबसूरत और मुकम्‍मल कविता को अभी तक किसी ने भी नहीं पढा..। बहुत बुरा लगा मुझे । मैं यहां आपको कुछ सफाई नहीं दे रहा.. एक रचना को दिल से सम्‍मान दे रहा हूं..जो कि उसका हक है..। आप चाहें तो इस कविता को आखर कलश्‍
    ा पर भी भेज सकते हैं । आभार ।।

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  2. बोहोत सशक्त कविता है, गहरे बोध से प्रस्फुटित , सधे शब्दों से अभिव्यक्त ! थोड़ी लय kअसि हुई हो सकती थी !

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